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जगन्नाथ मंदिर, पुरी


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नाम: श्री जगन्नाथ मंदिर
निर्माता: कलिंग राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव
जीर्णोद्धारक: 1174 ई. में उड़िया शासक अनंग भीम देव
देवता: भगवान जगन्नाथ
वास्तुकला: उड़िया वास्तु
स्थान: पुरी, उड़ीसा

पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर एक हिन्दू मंदिर है, जो कि भगवान
जगन्नाथ
(श्रीकृष्ण) को समर्पित है। यह भारत के उड़ीसा राज्य के तटवर्ती
शहर पुरी में स्थित है। जगन्नाथ शब्द का संधि विच्छेद करने पर जगत+नाथ= जगत
के नाथ या स्वामी होता है, जो कि इसका अर्थ है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी या
पुरी कहलाती है।  इस मंदिर को हिन्दुओं के चार धाम में से एक गिना
जाता है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है, जो कि भगवान विष्णु के अवतार श्री
कृष्ण को समर्पित है।  इस मंदिर की वार्षिक रथ यात्रा
उत्सव प्रसिद्ध है, जिसमें मंदिर के तीनों मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ,
उनके बड़े भ्राता बलभद्र (बलराम) और भगिनी सुभद्रा
तीनों, तीन अलग अलग भव्य और सुसज्जित रथों में विराजमान होकर नगर की यात्रा को
निकलते हैं। मध्य-काल से ही यह उत्सव अतीव हर्षोल्लस के साथ मनाया जाता है।
इसके साथ ही यह उत्सव भारत के ढेरों वैष्णव कृष्ण मंदिरों में मनाया जाता
है, एवं यात्रा निकाली जाती है।.यह मंदिर वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद
से जुड़ा हुआ है। यह गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के लिये खास महत्व रखता है,
जिसके संस्थापक श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान की ओर आकर्षित हुए थे, और कई
वर्षों तक पुरी में रहे भी थे। जगन्नाथ मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण यहां की रसोई
है। यह रसोई भारत की सबसे बड़ी रसोई के रूप में जानी जाती है। इस विशाल रसोई
में भगवान को चढाने वाले महाप्रसाद को तैयार करने के लिए ५०० रसोईए तथा उनके
३०० सहयोगी काम करते हैं।

 मंदिर का उद्गम


गंग वंश
की हाल ही में अन्वेषित ताम्र पत्रों से यह ज्ञात हुआ है, कि वर्तमान मंदिर के
निर्माण कार्य को कलिंग राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने आरम्भ कराया था।
मंदिर के जगमोहन और विमान भाग इनके शासन काल (1078 - 1148 ईसवी) में बने थे।
फिर भी सन 1174 ई. में जाकर उड़िया शासक अनंग भीम देव ने इस मंदिर को वर्तमान
रूप दिया था।

मंदिर में जगन्नाथ अर्चना सन 1558 तक होती रही, जब कि अफगान जनरल काला पहाड़
ने उड़ीसा पर हमला किया, तब तक। बाद में, रामचंद्र देब के खुर्दा में
स्वतंत्र राज्य स्थापित करने पर, मंदिर और इसकी मूर्तियों की पुनर्स्थापना हुई।

 मंदिर से जुड़ी कथाएं

इस मंदिर के उद्गम से जुडई परंपरागत कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की मूल
मूर्ति, एक अंजीर
वृक्ष के नीचे मिली, जो कि इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित थी। यह इतनी चकचौंध
करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा। मालवा नरेश
इंद्रद्युम्न के स्वप्न में यही मूति दिखाई दी। तब उसने कड़ी तपस्या की, और
तब भगवान विष्णु
ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये, और उसे एक दारु लकड़ी का
लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये। राजा ने ऐसा ही किया,
और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया। तब उसे विष्णु और विश्वकर्मा बढ़ई
कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए। तब उन्होंने यह शर्त
रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद
रहेंगे, और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये। माह के अंतिम दिन जब कई
दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो उत्सुकता वश उसने कमरे में झांका, और वह
वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया, और राजा से कहा, कि मूर्तियां अभी अपूर्ण
हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। राजा के अफसोस करने पर, मूर्तिकार ने बताया, कि
यह सब दैववश हुआ है, और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगीं। तब
वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गयीं।

 बौद्ध मूल

कुछ इतिहासकार यह सोचते हैं, कि इस मंदिर के स्थान पर पूर्व में एक बौद्ध
स्तूप होता था। उस स्तूप में गौतम बुद्ध का एक दांत रखा था। बाद में इसे
इसकी वर्तमान स्थिति, कैंडी, श्रीलंका
पहुंचा दिया गया।इस काल में बौद्ध धर्म को वैष्णव सम्प्रदाय ने आत्मसात कर लिया
था, जब जगन्नाथ अर्चना ने लोकप्रियता हासिल की। यह दसवीं शताब्दी के लगभग हुआ,
जब उड़ीसा में सोमवंशी राज्य चल रहा था।

महाराजा रणजीत सिंह, महान सिख सम्राट ने इस मंदिर को प्रचुर मात्रा में
स्वर्ण दान किया था, जो कि उनके द्वारा स्वर्ण मंदिर, अमृतसर को दिये गये
स्वर्ण से कहीं अधिक था। उन्होंने अपने अंतिम दिनों में यह वसीयत भी की थी, कि
विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा, जो कि विश्व में अबतक भी सबसे मूल्यवान और
सर्वाधिक बड़ा हीरा है, को इस मंदिर को दान कर दिया जाये। लेकिन यह सम्भव ना हो
सका, क्योकि उस समय तक, ब्रिटिश ने पंजाब पर अपना अधिकार करके , उनकी सभी शाही
सम्पत्ति जब्त कर ली थी। वर्ना कोहिनूर हीरा, भगवान जगन्नाथ के मुकुट की शान
होता।

 मंदिर का ढांचा

पुरी में रथयात्रा, जेम्स फर्गुसन द्वारा एक चित्र/पेंटिंग

मंदिर का वृहत क्षेत्र ४००,००० square feet (३७,००० m²) में फैला है, और
चहारदीवारी से घिरा है। उड़िया शैली के मंदिर स्थापत्यकला, और शिल्प के
आश्चर्यजनक प्रयोग से परिपूर्ण, यह मंदिर, भारत के भव्यतम स्मारक स्थलों में से
एक है।

मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का मंदिर है, जिसके शिखर पर विष्णु का श्री चक्र
(आठ आरों का चक्र) मंडित है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु
से निर्मित है, और अति पावन और पवित्र माना जाता है। मंदिर का मुख्य ढांचा एक
पाषाण चबूतरे पर बना है, और२१४ फीट (६५ मी.) ऊंचा है। इसके भीतर आंतरिक गर्भगृह
है, जहां मुख्य देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। यह भाग इसे घेरे हुए अन्य
भागों की अपेक्षा अधिक वर्चस्व वाला है। इससे लगे घेरदार मंदिर की पिरामिडाकार
छत, और लगे हुए मण्डप, अट्टालिकारूपी मुख्य मंदिर के निकट होते हुए ऊम्चे होते
गये हैं। यह एक पर्वत को घेरेहुए अन्य छोटे पहाड़ियों, फिर छोटे टीलों के समूह
रूपी बना है।

मुख्य मढ़ी (भवन) एक २० फीट (६.१ मी.) ऊंची दीवार से घिरा हुआ है। एक दूसरी
दीवार मुख्य मंदिर को घेरती है। एक भव्य सोलह किनारों वाला एकाश्म स्तंभ, मुख्य
द्वार के ठीक सामने स्थित है। द्वार दो सिंहों द्वारा रक्षित हैं।

 देवता

भगवान
जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा, इस मंदिर के मुख्य देव हैं। इनकी मूर्तियां, एक
रत्न मण्डित पाषाण चबूतरे पर गर्भ गृह में स्थापित हैं। इन मूर्तियों की अर्चना
मंदिर निर्माण से कहीं पहले ए की जाती रही है। सम्भव है, कि यह प्राचीन
जनजातियों द्वारा भी पूजित रही हो।

 उत्सव

यहां
विस्तृत दैनिक पूजा-अर्चनाएं होती हैं। यहां कई वार्षिक त्यौहार भी आयोजित होते
हैं, जिनमें सहस्रों लोग भाग लेते हैं। इनमें सर्वाधिक महत्व का त्यौहार है, रथ
यात्रा, जो कि आषाढ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को, तदनुसार लगभग जून या जुलाई माह में
आयोजित होता है। इस उत्सव में तीनों मूर्तियों को अति भव्य और विशाल रथों में
सुसज्जित होकर, यात्रा पर निकलते हैं।


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