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कृपा प्राप्ति भी सुपात्र को ही होती है



नेहरु नगर के प्रसिद्ध रामायणविद् श्री डी. पी. मिश्रा ने मुझे एक जोरदार बात बताई। उन्होने बताया कि उनके पास एक सज्जन अपनी समस्या लेकर आये। वे सज्जन कहते थे, मै रोज भगवान के नाम की दस माला जपता हूं फिर भी भगवान मेरी नही सुनते। मेरी समस्या ज्यों की त्यों है, उन्हे मुझ पर कृपा करनी ही चाहिए। श्री मिश्रा जी ने समझा-बुझा कर उस सज्जन को वापस भेज दिया पर जो बात उस सज्जन को नहीं कही, वह मुझे बताई। भगवान सबकी सुनते हैं पर कृपा केवल सुपात्र पर ही करते हैं। कई बार सुपात्र बनाने के लिए वे व्यक्ति की परीक्षा भी लेते हैं। व्यक्ति अपनी सोच व कर्मों से ही सुपात्र बन सकता है।
एक महापंडित रोज सुबह जोर- जोर से भगवान के नाम का जाप करता था। उसी वक्त पड़ोस का एक गरीब ब्राम्हण आकर चिल्लाने लगा, पंडित जी की जय, पंडित जी की जय। पंडित को अच्छा लगा, पूछने पर गरीब ब्राम्हण ने पंडित से काफी धन दौलत की मदद मांगी । पंडित जी ने उसे लौटा दिया। अब रोज जब पंडित भगवान के नाम का जाप करता, गरीब ब्राम्हण आकर नारे लगाता, मदद मांगता, पंडित उसे भगा देता । सातवें दिन पंडित खूब नाराज होकर ब्राम्हण से बोला कि पहले अपने अंदर योग्यता पैदा कर, फिर मांग, नही तो डंडे से पीटंूगा। गरीब ब्राम्हण बोला आप तो सात दिन में ही कितना विचलित हो गये। सुपात्रता के बिना भगवान को रोज जोर- जोर से चिल्ला कर क्यों डिस्टर्ब करते हो? भगवान आपसे खुश क्यों होंगे?
कितनी ज्यादा समझने वाली बात है यह। मदद मांगने वाला मदद मिलने को अपना अधिकार मानते हैं जबकि मदद देने वाले का नजरिया भी बहुत महत्वपूर्ण होता है । किसी के मदद न करने पर हम बहुत अधिक नाराज हो जाते हैं, उसके नजरिये और परिस्थिति को नजर-अंदाज कर देते है । ऐसे ही किसी मदद न करने वाले के प्रति आपके मन में आया आक्रोश दूर हो, मदद मांगने से पहले आप सुपात्र बने इस सद्भावना के साथ यह अंक समर्पित।
प्रधान संपादक
मधुर चितलांगिया

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कृपाप्राप्तिसुपात्रहोती

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