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Reflection of Chhattisgarh

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कार्यक्रम

Rajim Kumbh inaguration by Swami Nishchalannd Maharajराजिम के त्रिवेणी संगम पर छटवे "राजिम कुम्भ " का उद्घाटन पूरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरसवती के सानिध्य में हुआ . इस अवसर पर संस्कृति मंत्री ब्रिजमोहन अग्रवाल , विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक , मंत्री चंद्रशेखर साहू , संसद चंदुलाल साहू , विधायक राजिम अमितेश शुक्ल सहित साधू संत और श्रद्धालु उपस्थित थे .

राजिम कुम्भ मेला २०१० के उद्घाटन अवसर पर देश की सुप्रसिद्ध गायिका अनुराधा पौडवाल ने त्रिवेणी संगम पर स्थित मुख्य मंच में भजनों की प्रस्तुति दी इस अवसर पर विधान सभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक एवं प्रदेश के संस्कृति व पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने उनका गुलदस्ता व स्मृति चिन्ह प्रदान कर उनका सम्मान किया.

 राजिम के त्रिवेणी संगम पर 30 जनवरी से शुरू हो रहे "राजिम कुंभ मेला"  के दौरान हर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। माघपूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक 15 दिन चलने वाले राजिम कुंभ मेले के की सास्कृतिक संध्या कार्यक्रम छत्तीसगढ़ की विविधतापूर्ण लोक कला और संस्कृति देखने को मिलेगी। हर शाम छत्तीसगढ़ी कलाकारों के कार्यक्रम होंगे। इसके साथ ही देश के अनेक प्रसिध्द कलाकारों को भी कार्यक्रम देने का अवसर मिलेगा।

सांस्कृतिक संध्या में

शनिवार 30 जनवरी को दिलीप सारंगी भजन, अनुराधा पौडवाल भजन, राजीवलोचन श्लोक वाचन (ब्रम्हाचर्य आश्रम राजिम के आचार्यों द्वारा),
रूपकमहानदी अब मधुकर कदम रायपुर, राउत नाचा प्यारे यादव तुलसी, लोकमंच राजेन्द्र यादव बासीन, नाचासंतोष निषाद रिंगनी,

रविवार 31 जनवरी को सुगीतांजली शर्मा, दीपक चन्द्राकर, लाईट एण्ड साऊंड (अश्र), लोकमंचराजेन्द्र रंगीला रायपुर, भजनसंतोष शर्मा राजिम, रहसकाशीराम साहू रतनपुर, नाचाहेमलाल साहू सुरजीडीह,

सोमवार 1 फरवरी को दक्षिण मध्य सांस्कृतिक केन्द्र, सुकविता वासनिक, लाईट एण्ड साऊंड (उपाध्याय), लोक मंचमनोज सेन रायपुर, लोक मंचसीमा कौशिक रायपुर, नाचा देराम बनसांकरा,

मंगलवार 02 फरवरी को दक्षिण मध्य सांस्कृतिक केन्द्र, के.के.पाटिल भजन, मैं महानदी अंव, भजनमदन चौहान रायपुर, अलाप सांस्कृतिक मंच रायपुर, भजनकांतिलाल बरलोटा रायपुर, लोकरामायणललित ठाकुर कडार, मोरपिरोहिल तेजराम साहू रायपुर, सुगम संगीतजितेन्द्र परिहार शक्ति, नाचाडोमार सिंह कुवर दुर्ग 

बुधवार 03 फरवरी को दक्षिण मध्य सांस्कृतिक केन्द्र, रंजित बोस लाईट एण्ड साऊंड (इ%छा फिल्म), लोकमंच महेश वर्मा कुमहारी, लोकगीत नृत्यभारत भूषण परगनिया पाटन, नाचा अशोक कुमार साहू बिरकोनी,

गुरूवार 04 फरवरी को दक्षिण मध्य सांस्कृतिक केन्द्र प्रभंजय चतुर्वेदी, भजन अनमोल मणी रायपुर, (प्रजापति ब्र?हकुमारी संस्थान), छत्तीसगढ़ी गीत नृत्य सुनील तिवारी रायपुर, लोक दर्शनअमर श्रीवास भिलाई, नाचाराम विशाल साहू मांडर,

शुक्रवार 05 फरवरी को दक्षिण मध्य सांस्कृतिक केन्द्र सुसुनिता भाले, डॉ. राजा काले, खुमान साव, भजनभारती बंधु रायपुर, देश भक्ति गीतराजेश मिश्रा रायपुर, तबला वादनकु.रेशमा पंडित रायपुर, नाचा खेदुराम निषाद तुलसी,

शनिवार 06 फरवरी को मदन चौहान रायपुर भजन, जाकर हुसैन, राकेश शर्मा एवं साथी, भजनसुरस?मान रायपुर, मनभौंरालालजी श्रीवास बिलासपुर, लोकगीत नृत्यदीपक विराट राजनांदगांव, नाचाशंकर भोला नाच पार्टी खैरागढ़ तथा

रविवार 07 फरवरी को दुकालू यादव, अग्निहोत्री बंधु, भजननवलदास मानिकपुरी भिलाई, लोकमंचबलराम साहू मोहगांव कबीरधाम, भजनअवतार सिंह घंगल, चिन्हारीगीत नृत्य प्रस्तुतियां मणी राव, नाचारामू साहू अर्जुनी द्वारा कार्यRम पेश कए जाएंगे। इसी प्रकार

सोमवार 08 फरवरी को रविन्द्र जैन, भजनसुरेश दुबे खैरागढ़, भजन संध्याशिल्पी पाल कोलकाता, सुगम संगीत लतीफ कुरैशी रायपुर, लोकगीत नृत्यविष्णु कश्यप राजनांदगांव, नाचागरधारी विश्वकर्मा भिलाई,

मंगलवार 09 फरवरी को श्रीमती रमा दत्त जोशी, संजय पाण्डे, राजेन्द्र जैन, सुसीमा कौशिक, भजननिर्मला ठाकुर रायपुर, जसगीत"्राम देवादा जिला दुगर्, रामधुनी द्वारका साहू मेडेसरा, कुहकीरिखी क्षत्रीय भिलाई, नाचा अजय उमरे दुर्ग

बुधवार 10 फरवरी को पीसी लाल यादव, शैलेन्द्र भारती, भजनराजेश केशरी रायपुर, लोकमंचरामदास रायपुर, पंथी नृत्यडॉ.आर.एस.बारले भिलाई, लोकगीत नृत्य मनमोहन सिंह ठाकुर रायपुर, नाचा" राम बेलटुकरी साज राजिम,

गुरूवार 11 फरवरी को सुशील बाबेजा जी भजन, लोक भजन एवं नृत्यगरिमा एवं स्वर्णा दिवाकर, पंथीसरोज कोसरे दुर्ग लोक झंकारकरण शर्मा रायपुर,  नाचा राम फुडहर साज फुडहर

शुक्रवार 12 फरवरी को सुकविता कृष्ण मूर्ति, भजनप्रशांत ठाकुर रायपुर, सुगम संगीतअरविंद मिश्र रायपुर, पंथी नृत्यआरती देशलहरे गनियारी, लोकगीत नृत्य ममता शिंदे दुर्ग ,राउत नाचा लखन यादव मोहदा, नाचासंजय वर्मा खैरागढ़ के कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे।

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Chhattisgarh Rajim Kumbh

 


भारतीय मन प्रकृति के सारे उपहारों जल,अग्नि, वायु, पर्वत, वन सबको चकित करने वाले अनुभवों,कृपा और श्रद्धा के रुप में ग्रहण करता है। शायद यही कारण है कि तेजी से बदलते समय में भारतीयता का अद्भुत आलोक शेष है। आस्थाओं की रोशनी जब एक साथ लाखों ह्र्दयों में उतरती है,तब हम उसे कुंभ कह लेते हैं। इतिहास की चेतना से परे के ये अनुभव कभी महाकुंभ के रूप में जीवित होते हैं तो कभी छत्तीसगढ़ के राजिम में महानदी के तट पर। हमारा भारतीय मन इन तटों पर अपने भीतर पवित्रता का वह स्पर्श पाता है जो जीवन की सार्थकता को रेखांकित करता है। रायपुर से दक्षिण-पूर्व में करीब 45 किमी पर राजिम के त्रिवेणी संगम पर हर साल माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक लाखों श्रद्धा के तार एक साथ बजते हैं तब राजीव लोचन की उपस्थिति और ॠषि परम्परा से सारा जगत अर्थवान हो जाता है। अनादि काल से चल रहे चेतना के स्फुरण को,परम्परा और आस्था के इस पर्व को राजिम कुंभ कहा जाता है। गौरतलब है कि इस त्रिवेणी संगम में तीनों नदियां साक्षात प्रकट हैं जबकि इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम में सरस्वती लुप्तावस्था में है।

पुरातत्ववेत्ता राजिम के सुप्रसिद्ध राजीव लोचन मंदिर को आठवीं या नौवीं सदी का बताते हैं और एशियाटिक रिसर्च सोसायटी के रिचर्ड जैकिंस इसे राजा राम के समकालीन राजीव नयन नामक राजा से जोड़ते हैं लेकिन मंदिर के पुजारी ठाकुर ब्रजराज सिंह ने जो कथा बताई थी वह शायद इतिहास और कल्पना का मिश्रण होने के बाद भी सीधे दिल में उतर जाती है।
कथा कुछ यूं है-
त्रेता युग से भी एक युग पहले अर्थात सतयुग में एक प्रजापालक अनन्य भक्त था। उस समय यह क्षेत्र पद्मावती क्षेत्र या पद्मपुर कहलाता था। इसके आसपास का इलाका दंडकारण्य के नाम से प्रसिद्ध था। यहां अनेक राक्षस निवास करते थे। राजा रत्नाकर समय-समय पर यज्ञ,हवन,जप-तप सोमवंशी राजा हुआ,नाम था रत्नाकर। वह ईश्वर करवाते रहते थे ऐसे ही एक आयोजन में राक्षसों ने ऐसा विघ्न डाला कि राजा दुखी हो कर वहीं खंडित हवन कुंड के सामने ही ईश आराधना में लीन हो गए और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि वे स्वयं आकर इस संकट से उबारें। ठीक इसी समय गजेंद्र और ग्राह में भी भारी द्वन्द्व चल रहा था, ग्राह गजेंद्र को पूरी शक्ति के साथ पानी में खींचे लिए जा रहा था और गजेंद्र ईश्वर को सहायता के लिए पुकार रहा था।उसकी पुकार सुन भक्त वत्सल विष्णु जैसे बैठे थे वैसे ही नंगे पांव उसकी मदद को दौड़े। और जब वह गजेंद्र को ग्राह से मुक्ति दिलवा रहे थे तभी उनके कानों में राजा रत्नाकर का आर्तनाद सुनाई दिया। भगवान उसी रूप में राजा रत्नाकर के यज्ञ में पहुंचे और राजा रत्नाकर ने यह वरदान पाया कि अब श्री विष्णु उनके राज्य में सदा इसी रूप में विराजेंगे।तभी से राजीव लोचन की मूर्ति इस मंदिर में विराज रही है।कहते हैं कि इस मूर्ति का निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया था।

इतिहासकारों की दृष्टि से पकी हुई ईंटो से बने इस राजीव लोचन मंदिर का निर्माणकाल आठवीं सदी के लगभग ही माना जाता है।

पद्मपुर कैसे बना राजिम
जनश्रुति के अनुसार राजा जगतपाल इस क्षेत्र पर राज कर रहे थे तभी कांकेर के कंडरा राजा ने इस मंदिर के दर्शन किए और उसके मन में लोभ जागा कि यह मूर्ति तो उसके राज्य में स्थापित होनी चाहिए पुजारियों को धन का प्रलोभन दिया पर वे माने नही तो कंडरा राजा बलपूर्वक सेना की मदद से इस मूर्ति को ले चला। एक नाव में मूर्ति को रखकर वह महानदी के जलमार्ग से कांकेर रवाना हुआ पर धमतरी के पास रूद्री नामक गांव के समीप मूर्ति सहित नाव डूब गई और मूर्ति शिला में बदल गई, कंडरा राजा खिन्न मन से कांकेर लौट गया। उसी समय राजिम में महानदी के बीच में स्थित कुलेश्वर महादेव मंदिर की सीढ़ी से आ लगी इस "शिला" को देख 'राजिम' नाम की तेलिन उसे अपने घर ले गई और कोल्हू में रख दी। उसके बाद से तो उसका घर धन-धान्य से भर उठा उधर सूने मंदिर को देखकर दुखी होते राजा जगतपाल को भगवान ने स्वप्न दिया कि वे जाकर तेलिन के घर से उन्हें वापस लाकर प्रतिष्टित करें। पहले तो तेलिन राजी ही नही हुई पर अंतत: पुन:प्रतिष्ठा हुई और तभी से यह क्षेत्र राजिम तेलिन के नाम से राजिम कहलाने लगा। आज भी राजीव लोचन मंदिर के आसपास अन्य मंदिरों के साथ राजिम तेलिन का मंदिर भी विराजमान है।span>

जनेऊधारी क्षत्रिय यहां के पुजारी हैं
राजा रत्नाकर के समय से ही कहते हैं यहां ब्राम्हणों के स्थान पर क्षत्रिय पुजारी देव की सेवा में रहे हैं। स्तुतिपाठ आदि के लिए ब्राम्हण पुजारी भी नियुक्त होते हैं पर मुख्य पुजारी के पद पर क्षत्रियों का ही अधिकार है।

कुलेश्वर महादेव का मंदिर-
पंपंचमुखी महादेव का यह मंदिर त्रिवेणी संगम पर बना हुआ है। इसका निर्माण एक जगती पर किया गया है, सामान्यतया अन्य मंदिरों में जहां जगती का वास्तुसंस्थापन आयताकार रूप में है वहीं इस जगती को अष्टभुजाकार में प्रस्थापित किया गया है यह जगती 17 फुट ऊंची है।

यहां पर और भी कई प्राचीन मंदिर हैं जिनमे से कोई नौवीं सदी का है तो कोई आठवीं सदी का तो कोई 14वीं सदी का।r />
सोंढूर-पैरी-महानदी इन तीन नदियों के त्रिवेणी संगम तट पर बसा राजिम प्राचीनकाल से छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। लोगों की मान्यता है कि जगन्नाथपुरी ी की यात्रा तब तक सम्पूर्ण नही होती जब तक यात्री राजिम की यात्रा नही कर लेता। कहते हैं माघ पूर्णिमा के दिन स्वयं भगवान जगन्नाथ पुरी से यहां आते हैं।उस दिन जगन्नाथ मंदिर के पट बंद रहते हैं और भक्तों को भी राजीव लोचन में ही भगवान जगन्नाथ के दर्शन होते हैं। महाभारत के आरण्यक पर्व के अनुसार संपूर्ण छत्तीसगढ़ में राजिम ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहां बदरीनारायण का प्राचीन मंदिर है। इसका वही महत्व है जो जगन्नाथपुरी का है। इसीलिए यहां भी "महाप्रसाद" का खास महत्व है। यहां चावल से निर्मित "पीड़िया" नामक एक मिष्ठान्न भी प्रसाद के लिए उपलब्ध रहता है। माघ पूर्णिमा से यहां जो मेला लगता है उसकी छटा निराली ही होती है। यह मेला पंद्रह दिन तक चलता है। तो आईए आज से शुरु हो रहे राजिम कुंभ में। इस कुंभ में देश भर से नागा साधु व साधु-महात्माओं के अखाड़े विशेष रूप से आमंत्रित रहते हैं।





कैसे पहुंचे राजिम
हवाई मार्ग- रायपुर(45किमी) निकटतम हवाई अड्डा है तथा दिल्ली,मुंबई,नागपुर,भुवनेश्वर,कोलकाता,रांची, विशाखापट्नम और चेन्नई से जुड़ा हुआ है।
रेल मार्ग- रायपुर निकटतम रेलवे स्टेशन है जो कि मुंबई-हावड़ा रेल मार्ग पर स्थित है।
सड़क मार्ग- रराजिम नियमित बस तथा टैक्सी सेवा से रायपुर व महासमुंद से जुड़ा हुआ है।


Information sources: Chhattisgarh Tourism, Brijmohancg.org, Sanjit Tripathi Blog

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