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एक नजर में : राजिम अर्द्धकुंभ

प्रकृति और संस्कृति को बचाने का सन्देश दे गया राजिम अर्द्धकुंभ महोत्सव भारत में सदियों से धर्म -संस्कृति की गंगा प्रवाहित होती रही है और इसका प्रमुख केन्द्र देश में आयोजित होने वाले आस्थारूपी कुंभ रहे हैं। कुंभ जैसे आयोजन शायद ही किसी और देश में होते हों जहां पवित्र नदियों के किनारे करोड़ों लोग एक साथ मिलकर आस्था की डुबकी लगाते हैं, शंकराचार्यजी के शब्दों में : कुंभ - पर्व का लक्ष्य एकता का दर्शन और सृष्टी का कल्याण होता है. हरिद्वार में गंगा, प्रयाग में सरस्वती- यमुना -गंगा, नासिक में गोदावरी और उज्जैन में क्षिप्रा के तट पर कुंभ सदियों से लगता आया है अब इसी कड़ी में राजिम भी जुड़ गया है जहां महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के संगम के किनारे यानि प्रयागराज में प्रतिवर्ष होने वाले राजिम - कुंभ की उत्पत्ति हुई. देश में छत्तीसगढ की पहचान बन चुका राजिम- कुंभ इस वर्ष अर्द्धकुंभ महोत्सव के रूप में प्रगट हुआ. गोवर्धन पीठाधीश्वर जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने इस बार संस्कृति के साथ-साथ प्रकृति को भी बचाने का संदेश दिया. जिस पर मुहर लगाते हुए अर्द्धकुंभ के पालक मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि जहां धर्मात्माओं का राज, वहीं परमेश्वर का वास होता है. कोई भी कुंभ साधु संतों के बिना सार्थक नहीं हो सकता, राजिम कुंभ ने बहुत कम समय में देश विदेश में पहचान स्थापित की है.

शंकराचार्यजी के सुझावों का पूरा पालन होगा : संत-समागम में आये शंकराचार्य द्वय, अतिथि-संतों, नगा साधुओं और साध्वियों की उपस्थिति के गौरवशाली दृश्य ने हमें इस बात का अहसास करा दिया कि इतने असंतोष या संतोष के बीच में रहकर जीवन के विशाल प्रवाह में निः स्वार्थ होकर, निजता खोकर ही एक हुआ जाता है. भगवान शंकराचार्य के अनुसार कुंभ- पर्व का मेला मुखयतः साधुओं का ही माना जाता है.

 इस वर्ष प्रमुख तौर पर अग्नि पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर, श्री रामकृष्णानंद महाराज अमरकंटक, राजगुरू महामंडलेश्वर श्री स्वामी विच्चोकानंद महाराज बीकानेर, च पारण्य प्राकटय पीठाधीश्वर आचार्य श्री द्वारकेश्वरलाल महाराज, श्री माधवप्रियदास महाराज छारोड़ी गुरूकुल अहमदाबाद, तंत्र सम्राट श्री बिंदुजी महाराज हैदराबाद, बालयोगी श्री महंत शिवगिरी जी महाराज आहवान अखाड , श्री महंत हंसराम जी महाराज उदासीन भीलवाड, धर्मेन्द्र साहेब प्रयाग, श्री जीवनानंद चैतन्य महाराज ओंकारेश्वर, श्री जालेश्वर महाराज अयोध्या, साध्वी प्रतिभा दीदी छत्तीसगढ , स्वामी हनुमान उदासीन पुष्कर , श्री महंत लखनगिरी जी महाराज नीरंजनी अखाड , श्री राधेस्वरूप ब्रम्हचारी प्रयाग, दंडी स्वामी, रामाश्रम महाराज, दिगंबर स्वामी प्रयाग, श्री महंत हरकेवलदास जी महाराज अंबिकापुर तथा बाबा रामगिरी जी महाराज प्रयाग वाले उपस्थित थे.

अर्द्धकुंभ में बारह लाख से अधिक श्रद्धालु, पांच हजार से अधिक साधु-संत सहित एक दर्जन से अधिक अखाड़े, विभिन्न सम्प्रदाय के गुरूओं, महामण्डलेश्वरों की उस्थिति से गौरवान्वित राजिम अर्द्धकुंभ महोत्सव ने अपने कई रंग दिखाये. अर्द्धकुंभ में एक बात और हुई वह थी राजनीतिक शुचिता की.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता धर्मजीत सिंह ने साफ कर दिया कि उनका विरोध राजिम-कुंभ से नहीं बल्कि उसमें नजर आती वरिष्ठ नेता धर्मजीत सिंह ने साफ कर दिया कि उनका विरोध राजिम-कुंभ से नहीं बल्कि उसमें नजर आती त्रुटियों से होता है जिन्हें दुरूस्त करने के लिये सत्ता पक्ष का ध्यान आकृष्ट कराना विपक्ष का धर्म होता है. अब यदि यह कहें कि इस स्वीकारोक्ति ने उन लोगों को भी निरूतार कर दिया जो महज तुच्छ स्वार्थ से वशीभूत होकर राजिम- कुंभ के धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन पर बेमतलब के प्रश्न खड़ा करते रहे हैं, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी, अर्द्धकुंभ की महत्ता का प्रमाण शंकराचार्य श्री निश्चलानन्द सरस्वती के शब्दों ने भी दिया. आपको याद होगा कि पिछले साल उन्होंने कहा था कि राजिम-कुंभ का अनुसरण देश के अन्य कुंभों में भी होना चाहिये क्योंकि संतों का इतना सम्मान या सरकारी इंतजाम उन कुंभों में भी नजर नहीं आता जो वर्षो से आयोजित होते आ रहे हैं,

 मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने अपने उद्‌बोधन अर्द्धकुंभ के आयोजन को संतों का कुंभ करार दिया और कहा कि संत देश, धर्म और संस्कृति को जोड ने का काम करते हैं ओर राजिम-कुंभ इसका प्रतीक बना हैं. यह काम सत्ता से नहीं हो सकता. स्वामी बालकदासजी महाराज का अन्नपूर्णा महायज्ञ और साधु-संतों का एक महीने का कल्पवास अर्द्धकुंभ की सफलता का अंग बने। बात आस्था की डुबकी की करें तो दो दिनों तक मौसम की बेरूखी को दरकिनार करते हुये प्रतिदिन पचास हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं ने कुंभ में दस्तक दी. चारों पर्व स्नान के दिन परंपरा और विश्वाश का प्रगटीकरण करते हुये लाखों श्रद्धालुओं ने त्रिवेणी संगम पर डुबकी लगाई. आयोजन की संरक्षक बनी राज्य सरकार से लेकर आम आदमी तक ने भगवान राजीवलोचन व कुलेश्वर महाराज की पूजा अर्चना करते हुये उनका अभिषेक और पुण्यलाभ हासिल किया.

महामहिम राज्यपाल शेखर दत्त, विधानसभाध्यक्ष धरमलाल कौच्चिक, मुखयमंत्री डॉ. रमन सिंह, नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे, सांसद चंदूलाल चंद्राकर, श्रम मंत्री चंद्रच्चेखर साहू, गहृमंत्री ननकीराम कंवर, पंचायत मंत्री रामविचार नेताम, खाद्यमंत्री पुन्नू लाल मोहिले, महिला एवं बाल विकास मंत्री लता उसेण्डी, विधायक अमितेश शुक्ला, संत पवन दीवान, जिला पंचायत अध्यक्ष अशोक बजाज और नगर पालिका अध्यक्ष अंजना महाड़िक आदि ने राजिम-कुंभ में शिरकत कर पुण्यलाभ कमाया. कांचि कामकोटि पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती और द्वारिका पीठाधीश्वर स्वरूपानंद सरस्वती के अमृत वचनों के साथ-साथ महामण्डलेश्वर प्रेमानंद गिरी, दण्डी स्वामी, बिंदुजी महाराज, सच्चिदानंद महाराज आदि की उपस्थिति से राजिम-अर्द्धकुंभ धन्य हो उठा. विभिन्न समाजों के प्रसिद्ध संतों ने अपनी उपस्थिति दी जिनमें प्रमुख रूप से सतनामी संप्रदाय कं संत असंग साहेब, सतपाल महाराज और महंत अगस्त गिरी शामिल हैं, संतों की जमात का विशेष आकर्षण नागा साध्वी रहीं.

श्रद्धालुओं को धार्मिक प्रवचनों की ज्ञानमयी गंगा में प्रवाहित होने का अवसर भी मिला. प्रख्यात प्रवचनकार पं विजयशंकर मेहता ने किशकंधाकाण्ड पर ज्ञान - गंगा प्रवाहित की तो प्रखयात संत राजीवनयन महाराज और ज्ञानेश्वर महाराज की भागवत कथा का रसपान करने श्रद्धालु उमड पड़े.

संत समागम के मुख्य अतिथि रहे जगन्नाथ पीठाधीश्वर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के शब्दों में जिस तरह हजारों साधु-संत यहां उमड ते हैं, इसे देश का पांचवा कुंभ का दर्जा दिया जाना चाहिये. वैसे साधु-संतों के राजिम में आने का एक मकसद राज्य शासन द्वारा दी जाने वाली सम्मान राशि और मार्ग व्यय भी है. इलाहाबाद से आये स्वामी चिन्मयानंद के शब्दों में बाकी कुंभों में ऐसा नहीं होता. साधु-संतों की सेवा के नाम पर निकाला गया पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाता है लेकिन छत्तीसगढ सरकार ने पूरी ईमानदारी दिखाई हैं. किसी भी धार्मिक आयोजन की सफलता या उसे सर्वमान्य रूप से प्रतिष्ठापित करने की यह अनिवार्य शर्त है कि उसे समाज और धर्म दोनों का पर्याप्त समर्थन मिले इसकी प्रबल अभिव्यक्ति महाशिवरात्रि पर हुए अंतिम शाही स्नान में दिखाई दी.

 देशभर से आये एक दर्जन से अधिक अखाड़ों ने शाही स्नान में हिस्सा लिया. प्रातः सात बजे निकले शाही जुलुस का विशेष आकर्षण साधु-संतों का दरबार रहा. नागा साधुओं, आखंड़ो की उपस्थिति और धर्म-गुरूओं की उपस्थिति ने शाही जुलुस को इतना विशाल बना दिया कि उसकी झलक एक किलोमीटर तक देखी जा सकती थी. संस्कृति, धर्मस्व और पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल अपनी मेहनती टीम के साथ राजिम - कुंभ की आराधना में लगे रहे. आध्यात्मिक रंग में रंगे बृजमोहन अग्रवाल जब नागा साधुओं के साथ शाही जुलुस में हुए तो ऐसा लगा मानो राजसत्ता का मोह छोड उन्होंने वैराग्य धारण कर लिया हो. केशरिया वस्त्र पहने, हाथों में तलवार लिये अग्रवाल लिये एक सन्यासी की तरह नजर आये. पर्यटन और संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, जिन्हें संतों ने पिछले साल महामंडलेश्वर की उपाधि से नवाजा है, के बेहतरीन प्रबंध कौशल से राजिम-कुंभ निखर उठा. इस तर्क में कोई दलील नहीं दी जा सकती कि राजिम-कुंभ यदि देश भर में विख्यात हुआ है तो वह श्री अग्रवाल की सूझबूझ और कौशल का ही परिणाम हे. धरती पर उतरीं देवियां, राम का महानाट्‌य.... संत समागम स्थल पर नौ देवियों की जीवंत झांकी आकर्षण और श्रद्धा का केन्द्र बनी रही, झांकी देखकर लगा ही नहीं कि नौ देवियों के रूप में विराजमान मूर्तियां असल में नहीं बालिकायें हैं. बेहद प्रशिक्षित, अनुशासित, और ध्यानमगन इन लड़कियों को देखकर श्रद्धालु मोहित होकर रह गये. प्रजापति ब्रम्हकुमारी की संचालिका ब्रम्हकुमार पुष्प बहन ने बताया कि द्वाद्वच्च ज्योर्तिलिंग और देवियों की चैतन्य झांकियां पूरी नवरात्रि तक खुली रहीं और लाखों श्रद्धालुओं ने इसे सराहा. अर्द्धकुंभ महोत्सव सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केन्द्र भी बना जिसमें स्थानीय, प्रादेशिक और देश की ललित कलाएं जीवंत हुई.

 महाराष्ट्र का लावणी नृत्य, उड़ीसा का भांख नृत्य, पंजाब का भांगड़ा नृत्य के अलावा मथुरा से आये भक्तों द्वारा गौमाता पर लगाई गई चित्र प्रदर्शनी ने भी खास आकर्षित किया. वरिष्ठ गौ संरक्षक झुमरलाल टावरी और रामजीलाला अग्रवाल ने पूरे पांच दिनों तक श्रद्धालुओं को गौ माता से लाभ और उसके महत्व का प्रचार-प्रसार किया. छत्तीसगढ़ लोक मंच में कोदूराम वर्मा का कर्मा नृत्य, प्रतिमा बारले की पंडवानी, पूनाराम निद्गााद की पंडवानी, राजेन्द्र रंगीला का लोकमंच, भिलाई की ऋतु वर्मा की पंडवानी, रायपुर के मदन चौहान का भजन आदि प्रमुख आकर्षण रहे। विशेषतौर पर मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम पर आधारित महानाट्‌य भुलाये नहीं भूलेगा। ध्वनि, प्रकाच्च और सौ से ज्यादा कलाकारों के अभिनय पर केंद्रित इस नाट्‌यलीला का आनंद लाखों लोगों ने उठाया। लगभग दो घण्टे के इस महानाट्‌य में भगवान राम के सम्पूर्ण जीवन को उतारा गया है। खासतौर पर श्रवण कुमार और राजा दशरथ का दृच्च्य, सीता की अग्निपरीक्षा, जटायु गरूण का अनूठा चित्रण, हनुमान की पूंछ से लंका दहन, भावनाओं को स्पर्च्च करते सुरीले गीत, डिजीटल ध्वनि मुद्रण और आधुनिक तकनीक से सजे संगीत, अतिभव्य रंगमंच, सेट्‌स, तीस हजार वाटस का साऊंड, स्पेशल लाईट। इफेक्टस, तत्काल बदलने वाला भव्य सेटस आदि ने महानाट्‌य को सफल बनाने में पूरा योगदान दिया।

आशीर्वाद मुवीटोन प्राइवेट लिमिटेड के निर्माता विजय खेर के मुताबिक राजिम में इस महानाटय का यह 44 वां वर्ष था। अंचल में छुपे कलाकारों और उनकी कला को जीवंत करने में अर्द्धकुंभ का खासा योगदान रहा। कह सकते हैं कि आर्थिक समस्या के चलते जिन लोक कलाकारों को बहुत कम अवसर और सम्मान राशि मिलती है, यह कुंभ उनके लिये मददगार साबित हुआ है। कलाकारों ने शास्त्रीय, सुगम गायन, लोक-नृत्य और संगीत की यादगार प्रस्तुतियां दी। मुंबईया कलाकारों की अपेक्षा प्रादेशिक कलाकारों को भी अच्छा अवसर मिला। संस्कृति विभाग ने उनका पूरा सम्मान करते हुये सम्मानजनक राशि से नवाजा। छत्तीसगढ की पहचान बन चुकी लोक गायिका सीमा कौशिक के मुताबिक राजिम-कुंभ कलाकारों के लिये प्राण-वायु साबित हुआ है। वैसे छत्तीसगढ सरकार की तारीफ करनी चाहिये कि उसने खेल और फिल्मों से परे हटकर कला-संस्कृति की सुध लेकर राज्य और देश की सांस्कृतिक विरासत को मजबूती प्रदान की है।

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